Sunday, January 27, 2008

बराबरी और हक पर चर्चा चलना आम बात हो गई हैं हर एक आँख अपने संसार को अपने सपनों के जैसा देखना चाहती हैं , इस वजह से भी इंसानी ,हकदारी और बराबरी का जज्बा जोर मरता रहता हैं .पर सच इससे पूरी तरह से अलग हैं सबकी जीवन -शैली , पहचान , उपयोगिता सब कुछ अलग-अलग हैं। मानव समाज मे भी , न तो सबका रंग एक जैसा हैं न , ही कद , हर एक के , माली हालात रहन -सहन और ताकत मे काफी अंतर हैं । और यही हाल हर जानदार समाज का हैं । कुछ बाते जो एक जैसी लगती हैं वह ,ताकतवर की जयजयकार करने और पेट भरने की मजबूरी जैसी हो सकती हैं पर इसमे भी जीवन और मौत के तौर तरीको की तरह काफी फर्क हैं .हवा ,रौशनी , पानी जैसी खुदाई देन पर भी बराबरी का हक नही माना जा सकता हैं। कही गंदे पानी पीने तो कही गंदी हवा मे जीने की मजबूरी हैं ,और रही रौशनी की बात तो सबको सूरज भी नसीब नही हैं ,यह भी सभी जानते हैं ।
हर चीज मे गैरबराबरी के बाबजूद भी इन्सान ,बराबरी को इन्साफ मानता हैं तो इसे भूल तो नही कहा जा सकता पर सपनों को हकीकत मानना भी नाजायज ही हैं , ना कोई मालीक ना कोई गुलाम ,सबको रोटी क्प्ड़ा और मकान जैसी बराबरी की बाते सपना नही तो क्या हैं . सच ये भी हैं की बराबरी की कोई जरूरत भी नही हैं , मानव समाज की संरचना के अनूकूल बराबरी हैं भी नही . अगर बराबरी जरूरी होती तो संसार का रचनाकार , रचना भी वैसी ही करता । मांसाहारी और शाकाहारी के बीच का अंतर अगर नही बचा तो संसार कैसा होगा इसकी कल्पना की जा सकती हैं ।
बराबरी की मांग करने वालो को सबसे पहले बराबरी का मानक तय करना चाहीए अगर यह तय हो गया तो बराबरी अपने -आप आ जाएगी .पर यह भी तय की हर चीज मे बराबरी इतनी गैरबराबरी पैदा करेगी की आदमी तो क्या जानवर भी जीवन से तौबा करना पंसद करेगा । और हो सकता हैं इस बराबरी से बने ,असंतुलन की वजह से कही सारा समाज ही अपने अंत के बहुत करीब न पहुच जाये ।
बराबरी की इस बेमानी बहस से बेहतर होता की इन्सान और सभी जान्दारो की बेहतरी के लीए उनकी हैसीयत के अंदर बेहतर गुंजाईश बनाने की सोच जोर मारती । और यह अपने साथ पूरे समाज की भलाई के करने के लीए
सबसे सटीक कदम होता ,जो जीवन के सफर को कुछ आराम के साथ मंजील की ओर ले जाने वाला एक रास्ता बनता ।


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